सिख धर्म के 10 गुरु

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सिख धर्म के 10 गुरु

गुरु की महिमा को भगवान से भी अधिक माना गया है। किसी भी क्षेत्र में मार्गदर्शन प्राप्त करने हेतु शिक्षक का होना अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है। ऐसा ही अध्यात्म और अन्य क्षेत्र में भी होता है। हमारे गुरु “महंत श्री पारस भाई जी” भी एक उन्नत मार्गदर्शक हैं। वो लोगों को आध्यात्मिक विकास तथा आध्यात्मिक शिक्षा की ओर ले जाते हैं।

“गुरु” शब्द संस्कृत के गुरु से आया है जिसका तात्पर्य है शिक्षक या ज्ञान देने वाला। इसके अलावा गुरु को मार्गदर्शक या संरक्षक भी कहा जाता है। सिख धर्म की परंपराएं और दर्शन दस गुरुओं द्वारा स्थापित किए गए थे। महंत श्री पारस भाई जी ने बताया कि इन सभी दस गुरुओं में से प्रत्येक गुरु ने पिछले गुरु द्वारा सिखाए गए ज्ञान और संदेश को जोड़कर इसे और भी सुदृढ़ किया, जिससे सिख धर्म का निर्माण हुआ।

गुरु नानक पहले गुरु थे और उन्होंने एक शिष्य को उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। गुरु नानक ने कहा कि उनके गुरु भगवान हैं जो समय की शुरुआत से अंत तक एक ही हैं। गुरु गोबिंद सिंह मानव रूप में अंतिम गुरु थे। अपनी मृत्यु से पहले, गुरु गोबिंद सिंह ने 1708 में आदेश दिया कि गुरु ग्रंथ साहिब ही सिखों के अंतिम और शाश्वत गुरु होंगे। जब गुरु, या सतगुरु (सच्चा गुरु) का प्रयोग गुरबानी में किया जाता है तो इसका अर्थ मुख्यतः सत्यता की उच्चतम अभिव्यक्ति होता है।

गुरु की सेवा हमारे समाज की प्राथमिकता में शामिल है। सिख धर्म के 10 गुरुओं को सर्वश्रेष्ठ दर्जा दिया गया है। अंतिम गुरु गोबिंद सिंह महाराज के बाद फिर गुरु ग्रंथ साहिब को ही गुरु माना गया। मूर्ति पूजा से दूर समाज के लोग सिर्फ गुरु ग्रंथ साहिब के आगे ही अपना मत्था टेकते हैं।

कौन है सिख धर्म के 10 गुरु?

गुरु वह है जो अन्धकार से प्रकाश की ओर लाता है या वह है जो जीवन में प्रकाश डालता है। सिख धर्म के लोग गुरुनानक देव के अनुयायी हैं। सिख धर्म में कुल दस सिख गुरु थे। गुरुनानक देव का कालखंड 1469-1539 ई. है। सिख धर्म के लोग मुख्यतया पंजाब में रहते हैं। गुरु नानक के बाद लगातार नौ गुरु हुए जिन्होंने न केवल उनके उपदेशों और आदर्शों को कायम रखा बल्कि सिख समुदाय के लिए अपना महत्वपूर्ण योगदान भी दिया।

महंत श्री पारस भाई जी का कहना है कि सिख धर्म का दृष्टिकोण धार्मिक पक्षपात से रहित और उदार है। गुरुशाही को दसवें गुरु द्वारा पवित्र सिख ग्रन्थ, गुरु ग्रन्थ साहिब में पारित किया गया था, जिसे अब सिख पन्थ के अनुयायियों द्वारा जीवित गुरु माना जाता है। सिख समाज की ओर से गुरु ग्रंथ साहिब को गुरु माना गया। सिख गुरु सिख पन्थ के आध्यात्मिक गुरु हैं। 

महंत श्री पारस भाई जी आगे कहते हैं कि सिख धर्म का इतिहास बलिदान और त्याग का इतिहास है। आज हम सिख धर्म के दस गुरुओं के बारे में जानेंगे। सिख धर्म के इतिहास में सिख गुरुओं की लिस्ट निम्न है, इसमें उनकी गुरु बनने की तिथि और निर्वाण तिथि दी गयी है।

  • गुरु नानक देव जी महाराज (1507-1539)
  • गुरु अंगद देव जी महाराज (1539-1552)
  • गुरु अमरदास जी महाराज (1552-1574)
  • गुरु रामदास जी महाराज (1574-1581)
  • गुरु अरजन देव जी महाराज (1581-1606)
  • गुर हर गोबिंद जी महाराज (1606-1644)
  • गुरु हरि राय जी महाराज (1644-1661)
  • गुरु हरि किशन जी महाराज (1661-1664)
  • गुरु तेग बहादुर जी महाराज (1664-1675)
  • गुरु गोविंद सिंह जी महाराज (1675-1708)

गुरु नानक जी (Guru Nanak Ji)

गुरु नानक जी सिख धर्म के प्रवर्तक थे। वह पहले सिख गुरु हैं। यानि सिख परंपरा के अनुसार, सिख धर्म की स्थापना गुरु नानक (1469-1539) द्वारा की गई थी और बाद में नौ अन्य गुरुओं ने इसका नेतृत्व किया। गुरु नानक का जन्म 1469 ई. में लाहौर के निकट तलवंडी में हुआ था। गुरुनानक का जहां जन्म हुआ था वह स्थान आज उन्हीं के नाम पर अब ननकाना के नाम से जाना जाता है।

बचपन से ही प्रखर बुद्धिवाले थे गुरु नानक। उन्होंने अपना पूरा जीवन उन अच्छी बातों के प्रचार में लगाया जो संपूर्ण मानव जाति के लिए कल्याणकारी है। बचपन से ही उनका मन धर्म और अध्यात्म में लगता था। गुरुनानक ने स्वार्थपरता और असत्य बोलने से दूर रहने की शिक्षा दी। उन्होंने सभी को अपने धर्म का उपदेश दिया। उनके स्वचरित पवित्र पद तथा शिक्षाएँ (बानियाँ) सिखों के धर्मग्रन्थ “ग्रन्थ साहिब” में संकलित हैं। नानक देव की मृत्यु 1539 में हुई। उन्होंने सामाजिक सद्भाव की मिसाल कायम की और ऊंच-नीच का भेदभाव मिटाने के लिए लंगर की परंपरा चलाई।

गुरु अंगद देव जी महाराज (Guru Angad Ji)

गुरु अंगद (Guru Angad) सिखों के दूसरे गुरु थे। यानि वह दूसरे सिख गुरु हैं। इनको गुरु नानक देव ने ही इस पद के लिए मनोनीत किया था। गुरु नानक जी इनको अपने शिष्यों में सबसे अधिक मानते थे और अपने दोनों पुत्रों को छोड़कर उन्होंने अंगद को ही अपना उत्तराधिकारी चुना था।

गुरु अंगद ने गुरु नानक की रचनाओं को संकलित किया, जिसमें उन्होंने अपनी खुद की लिपि को एक नई लिपि में जोड़ा, जिसे गुरुमुखी के नाम से जाना जाता है। गुरुमुखी सिखों के पवित्र लेखन का एकमात्र माध्यम बन गया। गुरु अंगद श्रेष्ठ चरित्रवान व्यक्ति और सिखों के उच्चकोटि के नेता थे।

गुरु अमरदास जी महाराज (Guru Amardas Ji)

गुरु अमरदास जी महाराज तीसरे सिख गुरु हैं। वे चरित्रवान और सदाचारी थे। उन्होंने सिख धर्म का व्यापक ढंग से प्रचार किया। गुरु अमरदास जी आध्यात्मिक चिंतक थे। इनका जन्म 1479 को अमृतसर में हुआ था। लोग उन्हें अक्सर भक्त अमरदास जी कहकर पुकारते थे।

उन्होंने अपने से उम्र में छोटे गुरु अंगद देव जी को गुरु बना लिया और गुरु सेवा की। गुरु अमरदास जी ने सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ बहुत बड़ा आंदोलन चलाया। जाति प्रथा और ऊँच नीच के भेदभाव को उन्होंने लंगर प्रथा को मजबूत किया। गुरु अमरदास जी महाराज का भेदभाव को खत्म करने में बहुत बड़ा योगदान रहा है।

गुरु रामदास जी महाराज (Guru Ramdas Ji)

गुरु रामदास (Guru Ramdas) चौथे सिख गुरु हैं। गुरु रामदास जी महाराज का जन्म चूना मण्डी, लाहौर (अब पाकिस्तान में) 1534 को हुआ था। वे गुरू अमरदास साहिब जी के अति प्रिय व विश्वासपात्र थे। वे भारत के विभिन्न भागों में लम्बे धार्मिक प्रवासों के दौरान गुरु अमरदास जी के साथ ही रहते थे। वह अत्यंत साधु प्रकृति के व्यक्ति थे। वो अपनी भक्ति एवं सेवा के लिए काफी प्रसिद्ध हो गये थे।

गुरू अमरदास जी ने उन्हें गुरू बनने के योग्य पाया और फिर उन्हें चतुर्थ नानक या चौथे सिख गुरु के रूप में स्थापित किया। उन्होंने पवित्र शहर अमृतसर की नींव रखी। उन्होंने अमृतसर में एक जलाशय से युक्त भू-भाग दान दिया, जिसपर आगे चलकर स्वर्ण मंदिर (golden temple) का निर्माण हुआ। गुरु रामदास जी ने अपने गुरूओं द्वारा प्रदत्त लंगर प्रथा को आगे बढाया और अन्धविश्वास, वर्ण व्यवस्था आदि कुरीतियों का विरोध किया।

गुरु अरजन देव जी महाराज (Guru Arjan Ji)

गुरु अरजन देव जी पांचवें सिख गुरु हैं। इनका जन्म 1563 को हुआ था। सिख धर्म के इतिहास (Sikh Dharma History) में गुरु अर्जुन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहा जाता है। वह गुरु राम दास के पुत्र और उत्तराधिकारी थे। वे अपने युग के सर्वमान्य लोकनायक थे, जो दिन-रात संगत सेवा में लगे रहते थे।

पाँचवें गुरु अर्जुन (Guru Arjuna) ने सिखों के “आदि ग्रन्थ” नामक धर्म ग्रन्थ का संकलन किया, इसमें उनके पूर्व के चारों गुरुओं और कुछ हिन्दू और मुसलमान संतों की वाणी संकलित है। ग्रन्थ साहिब का सम्पादन गुरु अर्जुन देव जी ने भाई गुरदास की सहायता से 1604 में किया। सिख संस्कृति को गुरु जी ने घर-घर तक पहुंचाने के लिए अथाह प्रयास किए। गुरु जी शांत और गंभीर स्वभाव के स्वामी थे।

उनके मन में सभी धर्मो के प्रति अथाह स्नेह था। मानव-कल्याण के लिए उन्होंने आजीवन शुभ कार्य किए। सुखमनी साहिब उनकी अमर-वाणी है। करोड़ों लोग दिन चढते ही सुखमनी साहिब का पाठ कर शांति प्राप्त करते हैं।

गुर हर गोबिंद महाराज (Guru Hargobind Sahib Ji)

गुर हर गोबिंद जी महाराज छठे सिख गुरु हैं। गुर हर गोबिंद जी महाराज का जन्म 1595 को हुआ था। गुरु अर्जुन के पुत्र गुरु हरगोविंद (Guru Hargobind Sahib Ji) ने सिखों का सैनिक संगठन किया। उन्होंने एक छोटी-सी सिखों की सेना एकत्र की। अपने पिता श्री गुरु अर्जुन देव की शहीदी के आदर्श को उन्होंने न केवल अपने जीवन का उद्देश्य माना, बल्कि उनके द्वारा जो महान कार्य प्रारम्भ किए गए थे, उन्हें भी पूरा करने के लिए आजीवन आगे रहे। गुरु हरगोबिन्द साहिब जी ने शस्त्र एवं शास्त्र की शिक्षा भी ग्रहण की थी।

वह एक महान योद्धा भी थे। कई प्रकार के शस्त्र चलाने का उन्हें अद्भुत अभ्यास था। उनका मानना था कि सिख कौम शान्ति, भक्ति एवं धर्म के साथ-साथ अत्याचार एवं जुल्म का मुकाबला करने के लिए भी सशक्त बने। गुरु हरगोबिन्द साहिब जी बहुत परोपकारी योद्धा थे। उनका जीवन दर्शन जन-साधारण के कल्याण से जुडा हुआ था। उन्होंने अमर सिंहासन, अकाल तख्त का निर्माण किया।

गुरु हरि राय जी महाराज (Guru Har Rai ji Maharaj)

गुरु हरि राय जी महाराज सातवें सिख गुरु हैं। उनका जन्म सन 1630 को हुआ था। सिखों के छठे गुरु गुर हर गोबिंद सिंह जी को जब इस बात का पता चला कि उनका अंतिम समय निकट आ रहा है तो उन्होंने अपने पौत्र गुरु हरि राय जी सातवें नानक के रूप में घोषित किया। गुरू हरि राय जी एक महान आध्यात्मिक व राष्ट्रवादी महापुरुष और एक योद्धा भी थे। उन्होंने अपने पूर्व गुरुओं के मिशन को जारी रखा। गुरू हरि राय साहिब जी का शांत व्यक्तित्व लोगों को प्रभावित करता था। गुरु हरि राय जी महाराज एक आध्यात्मिक पुरुष होने के साथ-साथ एक राजनीतिज्ञ भी थे। गुरू हरराय साहिब जी प्रायः सिख योद्धाओं को बहादुरी के पुरस्कारों से नवाजा करते थे।

गुरु हरि किशन जी महाराज (Guru Hari Kishan Ji Maharaj)

गुरू हर किशन साहिब जी का जन्म 1656 को कीरतपुर साहिब में हुआ और 1664 को उनकी मृत्यु हुई। बचपन से गुरु हरि किशन जी बहुत ही गंभीर और सहनशील प्रकृति के थे। उनके पिता गुरु हरि राय जी महाराज सातवें सिख गुरु थे। 5 वर्ष की छोटी सी आयु में गुरू हर किशन साहिब जी को गुरुपद प्रदान किया गया था। गुरु हर राय जी ने 1661 में गुरु हरकिशन जी को आठवें गुरू के रूप में स्थापित किया। ऊंच नीच का भेदभाव मिटाकर उन्होंने सेवा का अभियान चलाया। अपने अन्त समय में गुरू साहिब ने सभी लोगों को निर्देश दिया कि कोई भी उनकी मृत्यु पर रोयेगा नहीं बल्कि गुरूबाणी में लिखे शब्दों को गायेंगे।

गुरु तेग बहादुर जी महाराज (Guru Tegh Bahadur Ji Maharaj)

उन्होने कश्मीरी पंडितों तथा अन्य हिन्दुओं को बलपूर्वक मुस्लिम बनाने का विरोध किया। मुगल शासक औरंगज़ेब ने उन्हे इस्लाम स्वीकार करने को कहा। उसने गुरु तेग बहादुर को बंदी बनाकर उनके सामने प्रस्ताव रखा कि या तो इस्लाम धर्म स्वीकार करो या फिर प्राण देने को तैयार हो जाओ। पर गुरु साहब ने कहा कि सीस कटा सकते हैं पर केश नहीं। तब औरंगजेब ने सबके सामने उनका सिर कटवा दिया।

विश्व के इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धान्त की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है। उनकी शहादत का समस्त सिख सम्प्रदाय पर गंभीर प्रभाव पड़ा। गुरुद्वारा शीश गंज साहिब तथा गुरुद्वारा रकाब गंज साहिब उन स्थानों का स्मरण दिलाते हैं जहाँ गुरुजी की हत्या की गयी और जहाँ उनका अन्तिम संस्कार किया गया था। गुरुजी मानवीय धर्म के लिए अपनी शहादत देने वाले एक क्रान्तिकारी युग पुरुष थे। श्री गुरु तेग बहादुर जी विश्व में प्रभावशील गुरू माने जाते हैं।

गुरु गोविंद सिंह जी महाराज (Guru Gobind Singh Ji Maharaj)

गुरु गोविंद सिंह जी महाराज दसवें और अंतिम सिख गुरु हैं। गुरु गोबिन्द सिंह का जन्म 22 दिसम्बर 1666 को हुआ था। गुरु गोबिन्द सिंह एक महान योद्धा, चिन्तक, कवि, भक्त एवं आध्यात्मिक नेता थे और साथ ही संस्कृत सहित कई भाषाओं के ज्ञाता भी थे। उन्होंने स्वयं कई ग्रन्थों की रचना की।

सन् 1699 में बैसाखी के दिन उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की जो सिखों के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दिन माना जाता है। अंतिम गुरु गोविंद सिंह जी ने सिखों को खालसा (शुद्ध) नामक सिख-संतों के एक अनुशासित, सैन्य आदेश में संगठित किया। उन्होंने सिखों में ऐसी अनुशासन की भावना भरी कि वे शक्ति बन गए। उन्होंने अपने पंथ का नाम खालसा रखा। उन्होंने पांच प्रतीकों की स्थापना की। यानि उन्होंने समस्त सिख समुदाय को एकता-सूत्र में बाँध कर रखने के विचार से सिखों के केश (लंबे बाल), कच्छ, कड़ा, कृपाण और कंघा, इन पाँच वस्तुओं को आवश्यक रूप में धारण करने का आदेश दिया।

धर्म की रक्षा के लिए समस्त परिवार का बलिदान किया। समस्त सिख समुदाय उनका इतना आदर करता था कि उनकी मृत्यु के बाद गुरु पद ही समाप्त कर दिया गया। गुरु गोबिन्द सिंह ने पवित्र (ग्रन्थ) गुरु ग्रंथ साहिब को पूरा किया तथा उन्हें गुरु रूप में प्रतिष्ठित किया। अपनी मृत्यु से कुछ समय पहले, गुरु गोबिंद सिंह ने गुरु ग्रंथ साहिब (सिख पवित्र ग्रंथ) को सिखों के लिए अंतिम आध्यात्मिक अधिकार घोषित किया।

सिख धर्म का विकास गुरु नानक और उनके उत्तराधिकारी नौ सिख गुरुओं की आध्यात्मिक शिक्षाओं से हुआ।

गुरु नानक के बाद नौ गुरुओं ने उनका अनुसरण किया और उनका कोई जीवित मानव उत्तराधिकारी नहीं है, लेकिन सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब को 11वां सिख गुरु माना जाता है।

यानि दसवें गुरु, गोबिंद सिंह ने सिख धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब को अपना उत्तराधिकारी नामित किया, जिससे मानव गुरुओं की श्रृंखला समाप्त हुई और धर्मग्रंथ को 11वें और अंतिम शाश्वत रूप से जीवित गुरु के रूप में स्थापित किया गया। सिख गुरुओं के भजनों के अलावा, गुरु ग्रंथ साहिब में मुस्लिम और हिंदू संतों की रचना भी शामिल है। सिख पवित्र पुस्तक को सिख धर्म की विश्वव्यापी भावना का एक अनूठा उदाहरण माना जा सकता है।

महंत श्री पारस भाई जी मानते हैं कि कोई भी धर्म सदैव प्रेम, सदाचार और भाईचारे का सन्देश देता है। आपके जीवन का प्रथम दर्शन यह होना चाहिए कि धर्म का मार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य की हमेशा विजय होती है।

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